where can i buy Lyrica tablets I’m not an activist; I don’t look for controversy. I’m not a political person, but I’m a person with compassion. I care passionately about equal rights. I care about human rights. –  Ellen De Generes

Deltasone by mail “All human beings are born free and equal in dignity and rights. They are endowed with reason and conscience and should act towards one another in a spirit of brotherhood.” These opening words of the Universal Declaration of Human Rights express a concept of man which underpins the framework of human rights embodied in the Universal Declaration and the two international covenants of Human Rights. It is a concept which, it derives most directly from Western political traditions, is in harmony with moral and social teachings to be found in many other traditions and patterns of belief.

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I am delighted to introduce National Human Rights and Crime Control Bureau a leading social organization, working for the protection of Human rights, liberties and social justice for all people at National & International Level., and providing legal assistance to the needy and under-privileged of the Indian Union, centers operating for the cause of spreading human rights awareness in order to break the barriers of class, caste, creed, color and religion. National Human Rights and Crime Control Bureau (NHRCCB) promotes art, culture, peace, harmony and brotherhood. National Human Rights and Crime Control Bureau ’s message is taken throughout the length and breadth of this country by its active members.

National Human Rights and Crime Control Bureahas several branches in India and abroad, having Thousands of dedicated volunteers. NHRCCB is a social organization for the ignored, disregarded, over-looked, victimized, oppressed, depressed, tortured people of the society and it cultivates awareness in them with regard to their rights. NHRCCB is a highly informative secured Human Rights Agency in the service of the humanity with full Legal status.

NHRCCB also delicately operating various rehabilitation courses , vocational training, higher education free of cost at every part of the corner , having control office .

 

HAPPINESS and SORROW are meant to be shared.  No one should be considered High or Low in the eyes of even the God men.  So should all be treated equally in the eyes of the State and the governmental machinery.  Gone are the days of bonded labor and slavery!  It should be considered a crime to ill-treat any one on account of gender, age, caste, color or religion.

 

Mr Randhir Kumar

5 yrs Integrated Masters in English

Central University of Jharkhand

Awardee – Young India Fellowship (2016-17)

Jharkhand Foundation Citizen Honor 2016

2017 National Education Award

2017 National Leaders Award

इंसान की बुनियादी जरूरतें क्या हैं ये सवाल दुनिया भर के बुद्धिजीवियों को अक्सर मथता है और मनुष्य के मूलभूत आवश्यकताओं का जब जिक्र आता है तो अक्सर ये रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित रह जाती हैं। बुनियादी जरूरतों के शिनाख्त की इस सूची से मैं इसलिए सहमत नही हो पाता कि ये इंसान और जानवर के जरूरतों में कोई मुकम्मल अंतर नही कर पाती। जानवरों को भी जीने के लिए खाने (रोटी) की जरूरत होती है, उन्हें भी आश्रय (मकान) की जरूरत पड़ती है। जहाँ तक कपड़ो की बात है तो ध्यान से देखें तो जानवरों को भी कपड़ों की जरूरत पड़ती है। ये अलग बात है कि उन्होंने इसका इंतेज़ाम लाखो वर्षों के evolution के जरिये किया है। फर, शरीर के विशिष्ट बाल ये उनके कपड़े ही तो हैं।

तो आखिर ऐसी कौन सी जरूरत है जो मनुष्य को मुकम्मल तौर पर जानवरों से अलग करती है ?? मेरे हिसाब से ये जरूरत है ‘सम्मान’ की। और इसलिए मेरा मानना है कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं प्रचलित मान्यतानुसार तीन न होकर चार हैं- रोटी, कपड़ा, मकान और सम्मान !! कह सकते हैं कि मनुज को मनुज उसकी यही आवश्यकता उसे बनाती है। और सम्मान की ये आवश्यकता मनुष्य के लिए कितनी जरूरी है इसकी तस्दीक इस बात से की जा सकती है कि अभी पूरी दुनिया के लिए जो चीज़ सबसे बड़े खतरे के तौर पर सामने आई है वो है दहशतगर्दी। और इस चीज़ का बहुत गहरा संबंध मनोविज्ञान की भाषा मे identity-crisis से है जो अंततः सम्मान की लड़ाई से जुड़ जाता है।

इसी बात को आगे ले जाये तो ये बात भी स्पष्ट होती है कि सम्मान और अधिकार थोड़ा भिन्न शाब्दिक अर्थ रखने के बावजूद बहुत हद तक एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। जब हम मानवाधिकार की बात करते हैं तो मनुष्य के इसी मूलभूत आवश्यकता को मनुज को उपलब्ध कराने की बात करते हैं। और इसलिए मनुष्य को सम्मान उपलब्ध कराने का संकल्प उसे रोटी, कपड़ा या मकान उपलब्ध कराने के संकल्प से कोई कम महती कार्य नही है। बल्कि शायद ये उससे ज्यादा ही महत्ता का काम है क्योंकि अगर व्यापक दृष्टि में देखा जाए तो इसके दायरे में रोटी, कपड़ा और मकान उपलब्ध कराने का संकल्प भी शामिल हो सकता है।

इसी बात को आगे ले जाये तो ये बात भी स्पष्ट होती है कि सम्मान और अधिकार थोड़ा भिन्न शाब्दिक अर्थ रखने के बावजूद बहुत हद तक एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। जब हम मानवाधिकार की बात करते हैं तो मनुष्य के इसी मूलभूत आवश्यकता को मनुज को उपलब्ध कराने की बात करते हैं। और इसलिए मनुष्य को सम्मान उपलब्ध कराने का संकल्प उसे रोटी, कपड़ा या मकान उपलब्ध कराने के संकल्प से कोई कम महती कार्य नही है। बल्कि शायद ये उससे ज्यादा ही महत्ता का काम है क्योंकि अगर व्यापक दृष्टि में देखा जाए तो इसके दायरे में रोटी, कपड़ा और मकान उपलब्ध कराने का संकल्प भी शामिल हो सकता है।

ABHINAV SANKAR